नई दिल्ली: बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाए गए POCSO कानून में सजा का प्रावधान काफी सख्त है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी आरोपी को केवल आरोपों और कानूनी अनुमान के आधार पर दोषी मान लिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने POCSO से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि अभियोजन पक्ष को अपने आरोपों की बुनियाद मजबूत सबूतों से साबित करनी होगी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने 17 सितंबर 2026 को दिए फैसले में आरोपी को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि POCSO एक्ट में आरोपी के खिलाफ मौजूद वैधानिक अनुमान (statutory presumption) अभियोजन पक्ष को अपने मामले की बुनियादी बातें साबित करने की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।
POCSO एक्ट में कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान का प्रावधान है। इसका मकसद बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के मामलों में कानून को प्रभावी बनाना है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इसी प्रावधान की सीमा को स्पष्ट किया। अदालत ने माना कि कानूनी अनुमान लगने के बाद भी कोर्ट को पूरे मामले में पेश किए गए सबूतों को देखना होगा। अगर अभियोजन पक्ष की कहानी में गंभीर विरोधाभास हों, मेडिकल सबूत आरोपों का समर्थन न करते हों या घटनाक्रम में ऐसी बातें सामने आएं जिनसे अभियोजन की कहानी कमजोर होती हो, तो अदालत उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकती। यानी केवल इसलिए कि मामला POCSO एक्ट के तहत दर्ज है, अभियोजन की हर बात को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के सामने आए मामले में आरोपी ने अभियोजन पक्ष की कहानी पर सवाल उठाते हुए कई परिस्थितियों और सबूतों का हवाला दिया। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों को देखने के बाद पाया कि अभियोजन की कहानी में असंगतियां, विरोधाभास और संभावनाओं से जुड़ी गंभीर कमियां थीं। मेडिकल साक्ष्य भी कथित यौन अपराध की पुष्टि नहीं कर रहे थे। अदालत ने यह भी देखा कि आरोपी की ओर से पेश किया गया बचाव पूरी तरह नजरअंदाज करने लायक नहीं था। इन सभी पहलुओं को एक साथ देखने के बाद पीठ इस निष्कर्ष पर पहुंची कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।
POCSO एक्ट की धारा 29 और 30 मामलों में काफी अहम भूमिका निभाती हैं। इन प्रावधानों के तहत कुछ परिस्थितियों में आरोपी के खिलाफ कानूनी अनुमान काम करता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अनुमान असीमित या अटल नहीं है। अगर आरोपी अभियोजन पक्ष के मामले में मौजूद कमियों, विरोधाभासों और अन्य साक्ष्यों के जरिए उस अनुमान को चुनौती देने में सफल होता है, तो अदालत को उन परिस्थितियों पर गंभीरता से विचार करना होगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी अभियोजन पक्ष की कहानी में मौजूद कमियों को सामने लाने में सफल रहा और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री ने अभियोजन के मामले को संदेह से परे साबित नहीं किया।
इस मामले में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया था। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो शीर्ष अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और पूरे घटनाक्रम की दोबारा समीक्षा की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 3 जुलाई 2025 के फैसले और ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। पीठ ने आरोपी को संबंधित अपराधों से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला आवश्यक कानूनी स्तर तक साबित करने में असफल रहा। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर आरोपी किसी अन्य मामले में आवश्यक रूप से हिरासत में नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
इस फैसले का बड़ा पहलू यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने POCSO जैसे सख्त कानून के उद्देश्य और आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन की बात स्पष्ट की है। POCSO एक्ट बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया है और इसके तहत मामलों में विशेष कानूनी प्रावधान लागू होते हैं। लेकिन अदालत ने यह साफ किया कि कानून में मौजूद presumption का इस्तेमाल इस तरह नहीं किया जा सकता कि अभियोजन पक्ष को अपने मामले की विश्वसनीयता साबित करने की जरूरत ही न रहे। अदालत के सामने हर मामले में उपलब्ध गवाही, मेडिकल रिपोर्ट, परिस्थितिजन्य साक्ष्य और बचाव पक्ष की दलीलों को कानून के मुताबिक परखा जाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि POCSO मामलों में अक्सर धारा 29 और 30 के तहत कानूनी अनुमानों की भूमिका सामने आती है। इस फैसले से यह बात फिर स्पष्ट हुई है कि कानूनी अनुमान और दोषसिद्धि एक ही चीज नहीं हैं। पहले अभियोजन पक्ष को आरोप से जुड़े जरूरी बुनियादी तथ्य स्थापित करने होंगे। इसके बाद कानून के तहत अनुमान लागू हो सकता है। लेकिन अगर रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य अभियोजन की कहानी को कमजोर करते हैं और आरोपी प्रभावी तरीके से उस अनुमान को rebut कर देता है, तो अदालत को पूरे मामले का निष्पक्ष मूल्यांकन करना होगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बताता है कि किसी भी आपराधिक मामले में कानून की सख्ती के साथ-साथ सबूतों की गुणवत्ता और न्यायिक जांच भी उतनी ही अहम रहती है।

