उत्तराखंड के पहाड़ों में बारिश के साथ भूस्खलन का डर भी बढ़ जाता है। सड़क पर अचानक पहाड़ से मलबा आ जाना या जमीन का खिसकना यहां रहने वाले लोगों के लिए कोई नई बात नहीं है। इसी खतरे को लेकर एनआईटी श्रीनगर के एक अध्ययन में चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है।

अध्ययन के मुताबिक श्रीनगर और आसपास का 22 फीसदी से ज्यादा क्षेत्र भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील है। इस रिपोर्ट ने पहाड़ी इलाकों में तेजी से हो रहे निर्माण और विकास कार्यों को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों पर किसी भी तरह का निर्माण करने से पहले वहां की जमीन, ढलान और भौगोलिक स्थिति को समझना बेहद जरूरी है।

कुछ इलाकों में खतरा ज्यादा

श्रीनगर क्षेत्र में कई जगह पहाड़ों की ढलान काफी खड़ी है। ऐसे इलाकों में लगातार बारिश होने पर मिट्टी और चट्टानों की पकड़ कमजोर पड़ सकती है। इसके बाद छोटे-बड़े भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। खासकर मानसून के दौरान यह खतरा ज्यादा रहता है। भूस्खलन होने पर सड़कें बंद हो जाती हैं, यातायात प्रभावित होता है और कई बार लोगों के घरों और दूसरी संपत्तियों तक को नुकसान पहुंचता है।

निर्माण से पहले जोखिम समझना जरूरी

पहाड़ी इलाकों में सड़क चौड़ीकरण, भवन निर्माण और दूसरी परियोजनाओं के लिए पहाड़ों की कटिंग की जाती है। अगर ऐसे काम संवेदनशील जगहों पर बिना पर्याप्त अध्ययन के किए जाएं तो भूस्खलन का खतरा और बढ़ सकता है। एनआईटी के अध्ययन से सामने आए आंकड़े भविष्य की योजनाओं के लिए मददगार हो सकते हैं। इससे प्रशासन यह तय कर सकता है कि किस इलाके में निर्माण करना सुरक्षित है और कहां अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है।

बारिश में बढ़ जाती है परेशानी

उत्तराखंड में मानसून के दौरान पहाड़ों पर लगातार बारिश होती है। ऐसे में पहले से कमजोर ढलानों पर दबाव बढ़ जाता है। कई बार कुछ घंटों की तेज बारिश ही सड़क पर भारी मलबा लाने के लिए काफी होती है। इसी वजह से संवेदनशील इलाकों की पहले पहचान करना जरूरी है, ताकि समय रहते सुरक्षा के इंतजाम किए जा सकें।

विशेषज्ञों के मुताबिक पहाड़ों में विकास जरूरी है, लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो वहां की प्राकृतिक स्थिति को समझकर किया जाए। श्रीनगर क्षेत्र को लेकर सामने आया यह अध्ययन इसी दिशा में एक अहम संकेत माना जा रहा है। अगर इन वैज्ञानिक आंकड़ों को विकास योजनाओं में शामिल किया जाता है तो आने वाले समय में भूस्खलन से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।

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