लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बच्चों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए स्थापित किए गए राजकीय बेसिक विद्यालयों की मौजूदा स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। प्रदेश में कभी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से खोले गए इन विद्यालयों में कई अब बंद हो चुके हैं। जो स्कूल किसी तरह संचालित हो रहे हैं, वहां भी पर्याप्त शिक्षक और विद्यार्थी नहीं हैं। शिक्षा निदेशालय की ओर से कराए गए आकलन में विद्यालयों की स्थिति ऐसी सामने आई है, जिससे इनके अस्तित्व और संचालन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

प्रदेश में कुल 68 राजकीय बेसिक विद्यालय स्थापित किए गए थे। इनमें तीन विद्यालय बालक वर्ग के, 41 बालिका वर्ग के, 23 सह शिक्षा वाले और एक कंपोजिट विद्यालय था। लेकिन समय के साथ इन स्कूलों की स्थिति लगातार खराब होती गई। पिछले वर्ष शिक्षा निदेशालय की ओर से इन विद्यालयों की स्थिति का आकलन कराया गया तो पता चला कि बड़ी संख्या में स्कूल या तो बंद हो चुके हैं या फिर नाममात्र के लिए संचालित हैं।

68 में 26 विद्यालय पूरी तरह बंद

आकलन के मुताबिक प्रदेश में स्थापित 68 राजकीय बेसिक विद्यालयों में से 26 विद्यालय बंद हो चुके हैं। यानी एक समय पर बच्चों को शिक्षा देने के लिए बनाए गए करीब एक तिहाई स्कूल अब नियमित रूप से संचालित नहीं हो रहे हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति बालक वर्ग के विद्यालयों की है। प्रदेश में स्थापित तीनों राजकीय बेसिक बालक विद्यालयों में से एक भी विद्यालय संचालित नहीं मिला। तीनों विद्यालय बंद पाए गए। इससे साफ है कि इन स्कूलों को शुरू करने के पीछे जो उद्देश्य था, वह लंबे समय तक व्यवस्था और निगरानी के अभाव में पूरा नहीं हो सका।

बालिका और सह शिक्षा विद्यालयों में भी हालात बेहतर नहीं

आकलन में सामने आया कि 41 राजकीय बेसिक बालिका विद्यालयों में से केवल 21 विद्यालय संचालित मिले। वहीं 23 सह शिक्षा विद्यालयों में भी सिर्फ 21 विद्यालयों में संचालन पाया गया। एक कंपोजिट विद्यालय की स्थिति भी आकलन में शामिल रही। इस तरह कुल मिलाकर 42 विद्यालय वर्तमान में संचालित बताए गए हैं, लेकिन इन विद्यालयों में भी शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह पटरी पर नहीं है। सबसे बड़ी समस्या शिक्षकों की कमी की है।

42 स्कूलों के लिए सिर्फ 39 शिक्षक

संचालित विद्यालयों में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए पर्याप्त शिक्षक तक उपलब्ध नहीं हैं। आंकड़ों के अनुसार 42 संचालित विद्यालयों में केवल 39 शिक्षक नियुक्त हैं। सामान्य तौर पर अगर प्रत्येक स्कूल में कम से कम एक शिक्षक की जरूरत मानी जाए तो भी तीन विद्यालय ऐसे रह जाते हैं, जहां बच्चों को पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक उपलब्ध नहीं है। स्थिति इससे भी गंभीर हो सकती है। अगर किसी विद्यालय में दो या उससे अधिक शिक्षक तैनात हैं तो दूसरे स्कूलों में शिक्षक विहीन होने की संख्या और बढ़ जाएगी। यानी कागजों पर विद्यालय संचालित होने के बावजूद जमीन पर बच्चों की पढ़ाई के लिए पर्याप्त मानव संसाधन मौजूद नहीं है।

44 विद्यालयों में शिक्षक नहीं होने की स्थिति

आकलन में शिक्षकों की तैनाती को लेकर भी बेहद गंभीर तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार कुल विद्यालयों में से 44 स्कूल ऐसे हैं, जहां शिक्षकों की तैनाती नहीं है, जबकि केवल 24 विद्यालयों में शिक्षक उपलब्ध हैं। इसका सीधा असर इन विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों पर पड़ रहा है। स्कूल की इमारत, नामांकन और सरकारी रिकॉर्ड होने भर से शिक्षा व्यवस्था नहीं चल सकती। शिक्षक नहीं होंगे तो विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई कैसे होगी, यह सबसे बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।

1260 विद्यार्थी पंजीकृत, लेकिन व्यवस्था कमजोर

संचालित विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत अधिक नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन स्कूलों में 243 छात्राएं और 1017 बालक पंजीकृत हैं। यानी कुल करीब 1260 विद्यार्थी इन विद्यालयों से जुड़े हुए हैं। इन बच्चों के लिए पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध न होना शिक्षा व्यवस्था की गंभीर कमी को दिखाता है। खासकर ऐसे समय में जब सरकारी स्तर पर स्कूलों में नामांकन बढ़ाने, ड्रॉपआउट कम करने और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने पर जोर दिया जाता है, राजकीय विद्यालयों की यह स्थिति चिंता पैदा करती है।

1990 के बाद नहीं हुई शिक्षकों की नियुक्ति

इन विद्यालयों की बदहाली की एक बड़ी वजह लंबे समय से शिक्षकों की नई नियुक्तियां नहीं होना बताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक 1990 के बाद इन विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हुई। इसका असर धीरे-धीरे विद्यालयों के संचालन पर पड़ा। जो शिक्षक पहले से तैनात थे, वे समय के साथ सेवानिवृत्त होते गए या अन्य कारणों से पद खाली होते गए। लेकिन खाली पदों को भरने की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं बन सकी। नतीजा यह हुआ कि कई विद्यालय शिक्षक विहीन हो गए और धीरे-धीरे उनमें विद्यार्थियों की संख्या भी घटती चली गई।

स्कूल खुले, लेकिन व्यवस्था आगे नहीं बढ़ी

राजकीय बेसिक विद्यालयों की स्थापना के पीछे उद्देश्य था कि बच्चों को बेहतर शिक्षा का अवसर मिले और सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया जा सके। शुरुआत में इन विद्यालयों में शिक्षकों और विद्यार्थियों की व्यवस्था भी रही होगी, लेकिन लंबे समय तक नियुक्तियां नहीं होने से पूरी व्यवस्था कमजोर होती गई।

शिक्षक कम हुए तो विद्यार्थियों का नामांकन प्रभावित हुआ। विद्यार्थियों की संख्या कम हुई तो स्कूलों के नियमित संचालन पर असर पड़ा। कई जगह स्थिति इतनी खराब हुई कि विद्यालय पूरी तरह बंद हो गए। अब सवाल यह है कि जिन विद्यालयों में न पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही बड़ी संख्या में विद्यार्थी, उन्हें किस तरह दोबारा सक्रिय किया जाएगा।

बंद विद्यालयों को फिर शुरू करने की चुनौती

26 विद्यालयों का बंद होना केवल स्कूल भवनों के बंद होने का मामला नहीं है। इसके पीछे सरकारी संसाधनों, शिक्षण व्यवस्था और बच्चों के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल है। इन विद्यालयों को दोबारा संचालित करने के लिए सबसे पहले यह तय करना होगा कि वहां कितने शिक्षक और कितने विद्यार्थी उपलब्ध हो सकते हैं। यदि विद्यालयों को दोबारा खोलने की योजना बनती है तो शिक्षकों की नियुक्ति सबसे जरूरी होगी। इसके साथ ही विद्यालय भवनों की स्थिति, आसपास के क्षेत्र में बच्चों की संख्या, नामांकन की संभावना और स्कूल तक विद्यार्थियों की पहुंच जैसे पहलुओं का भी आकलन करना होगा।

सरकारी स्कूलों की निगरानी पर भी सवाल

इन आंकड़ों ने सरकारी विद्यालयों की लंबे समय तक निगरानी और समीक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि किसी विद्यालय में वर्षों से शिक्षक नहीं हैं या वह नियमित रूप से संचालित नहीं हो रहा है, तो उसकी जानकारी विभागीय स्तर पर समय रहते सामने आनी चाहिए। ऐसे विद्यालयों के लिए समय-समय पर समीक्षा, शिक्षकों के रिक्त पदों की पहचान और जरूरत के अनुसार नियुक्ति की व्यवस्था जरूरी है। केवल स्कूल खोल देना पर्याप्त नहीं है। उसके नियमित संचालन के लिए शिक्षक, विद्यार्थी, संसाधन और प्रशासनिक निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

अब अस्तित्व बचाने की चुनौती

राजकीय बेसिक विद्यालयों की मौजूदा तस्वीर यह बताती है कि वर्षों पहले स्थापित किए गए कई स्कूल आज अपनी मूल पहचान खोने की स्थिति में पहुंच चुके हैं। 68 विद्यालयों में से 26 का बंद होना और संचालित स्कूलों में भी शिक्षकों की कमी शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन विद्यालयों को बच्चों को शिक्षा देने के लिए बनाया गया था, वे खुद ही व्यवस्था के अभाव में बंद होने की स्थिति में क्यों पहुंच गए।

अब विभाग के सामने चुनौती सिर्फ बंद स्कूलों को दोबारा खोलने की नहीं, बल्कि उनमें स्थायी शिक्षक नियुक्त करने, विद्यार्थियों का नामांकन बढ़ाने और नियमित पढ़ाई सुनिश्चित करने की भी है। यदि समय रहते इन विद्यालयों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में कई और स्कूलों के बंद होने का खतरा बना रहेगा। वहीं, इन विद्यालयों से जुड़े विद्यार्थियों को भी बेहतर शिक्षा के लिए दूसरे स्कूलों का रुख करना पड़ सकता है।

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