उत्तर प्रदेश में राजस्व से जुड़े मामलों को लटकाना अब अफसरों को महंगा पड़ने लगा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर राजस्व परिषद ने कामकाज में लापरवाही और वादों के निस्तारण में देरी बरतने वाले पांच अधिकारियों पर गाज गिराई है। इनमें चार तहसीलदार और एक नायब तहसीलदार शामिल हैं। सभी को तत्काल प्रभाव से निलंबित करते हुए विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है।
दरअसल, मुख्यमंत्री ने हाल ही में प्रदेशभर की तहसीलों में लंबित राजस्व वादों की स्थिति की समीक्षा की थी। इस बैठक में साफ निर्देश दिए गए थे कि दाखिल-खारिज, पैमाइश और अन्य राजस्व मामलों का निस्तारण तय समय-सीमा के भीतर हो, और जो अफसर इसमें कोताही बरतें, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएं।
राजस्वपरिषद की आयुक्त एवं सचिव कंचन वर्मा ने सरकार की मंशा को ध्यान में रखते हुए अधिकारियों और न्यायालय स्तर पर जांच शुरु कर दी। जिसके बाद कुछ न्यायालयों में वाद निस्तारण की धीमी प्रगति को देखते हुए कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है। जिन अधिकारियों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित किया गया है।
जिन अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है उनमें चार तहसीलदार और एक नायब तहसीलदार शामिल हैं। निलंबित तहसीलदारों में पवन कुमार (प्रतापगढ़), अतुल हर्ष (बलिया), हरेराम यादव (गोंडा), आनंद ओझा (संत कबीर नगर), विवेक कुमार सिंह (लखनऊ) शामिल है। सरकार की मंशा साफ है कि किसानों और आम नागरिकों को राजस्व अदालतों में जल्द, पारदर्शी और आसान न्याय मिले।
लंबे समय से जमीन विवाद, नामांतरण और पैमाइश जैसे मामलों में देरी की शिकायतें मिलती रही हैं, जिससे लोगों को बार-बार तहसील के चक्कर काटने पड़ते हैं। अब सरकार इस दिशा में जवाबदेही तय करने की कोशिश में जुटी है, ताकि अफसरशाही की सुस्ती की वजह से जनता को परेशानी न झेलनी पड़े।
रिपोर्ट- सोनू सिंह

