उत्तर प्रदेश में क्रिकेट का जुनून किसी से छिपा नहीं है। गांव-कस्बों से लेकर बड़े शहरों तक बड़ी संख्या में युवा क्रिकेट को अपना करियर बनाना चाहते हैं। प्रदेश में लगातार बेहतर होते क्रिकेट इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रतिभाओं की बड़ी संख्या के बीच अब एक सवाल तेजी से उठ रहा है, क्या 25 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले उत्तर प्रदेश को रणजी ट्रॉफी में सिर्फ एक टीम के साथ ही खेलना चाहिए?

खेल से जुड़े लोगों और क्रिकेट प्रेमियों का मानना है कि इतने बड़े प्रदेश में एक ही रणजी टीम होने से हर प्रतिभाशाली खिलाड़ी को पर्याप्त मौका नहीं मिल पाता। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश को क्षेत्रीय आधार पर बांटकर एक से ज्यादा घरेलू टीमें उतारने की मांग अब जोर पकड़ रही है।

महाराष्ट्र और गुजरात का उदाहरण सामने

इस मांग के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह है कि एक ही राज्य से कई टीमें भारतीय क्रिकेट के घरेलू ढांचे में खेल रही हैं। महाराष्ट्र से मुंबई, महाराष्ट्र और विदर्भ, जबकि गुजरात से गुजरात, बड़ौदा और सौराष्ट्र जैसी टीमें घरेलू क्रिकेट में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि करीब 25 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में सिर्फ एक टीम ही क्यों हो? मांग करने वालों का सुझाव है कि प्रदेश को पूर्वांचल, पश्चिमी यूपी, अवध और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में बांटकर अलग-अलग टीमों को घरेलू क्रिकेट में मौका दिया जा सकता है।

सीएम योगी भी उठा चुके हैं खिलाड़ियों को ज्यादा मौके देने का मुद्दा

उत्तर प्रदेश की क्रिकेट प्रतिभाओं को ज्यादा अवसर देने की जरूरत का मुद्दा राजनीतिक स्तर पर भी सामने आ चुका है। यूपी टी-20 लीग के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की विशाल आबादी और युवाओं को खेल के ज्यादा अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया था। उनके इस रुख को बहु-टीम मॉडल की मांग से जोड़कर देखा जा रहा है। समर्थकों का कहना है कि अगर प्रदेश में क्रिकेटरों की संख्या इतनी बड़ी है, तो उन्हें सिर्फ एक राज्य टीम में जगह बनाने की होड़ तक सीमित रखने के बजाय ज्यादा प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराने पर विचार होना चाहिए।

पूर्व रणजी खिलाड़ी मोहसिन रजा भी उठा रहे आवाज

पूर्व रणजी क्रिकेटर और यूपी स्पोर्ट्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष मोहसिन रजा भी इस मुद्दे को लंबे समय से उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में क्रिकेट की प्रतिभाओं को पर्याप्त घरेलू मैच और प्रतिस्पर्धी मंच मिलना जरूरी है। उनकी ओर से बीसीसीआई और संबंधित खेल संस्थाओं के सामने भी बहु-टीम मॉडल का मुद्दा उठाए जाने की बात सामने आई है। उनका मानना है कि इससे उन खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मौका मिल सकता है, जो प्रतिभा होने के बावजूद मौजूदा व्यवस्था में टीम तक नहीं पहुंच पाते।

यूपी में क्रिकेट इंफ्रास्ट्रक्चर भी तेजी से बढ़ रहा

उत्तर प्रदेश में क्रिकेट के लिए सुविधाएं पहले के मुकाबले काफी बेहतर हुई हैं। कानपुर का ग्रीन पार्क देश के ऐतिहासिक क्रिकेट मैदानों में शामिल है। वहीं लखनऊ का इकाना स्टेडियम आधुनिक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का बड़ा केंद्र बन चुका है। पूर्वांचल में वाराणसी का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम भी क्रिकेट गतिविधियों को नया आधार देने की दिशा में अहम माना जा रहा है। इसके अलावा नोएडा और ग्रेटर नोएडा में भी क्रिकेट से जुड़ी सुविधाएं और मैदान मौजूद हैं।

ऐसे में बहु-टीम मॉडल के समर्थकों का कहना है कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में खिलाड़ियों को स्थानीय स्तर पर मजबूत करने के लिए उपलब्ध इंफ्रास्ट्रक्चर का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

सिर्फ 15-20 खिलाड़ियों तक सीमित रह जाता है मौका

एक रणजी टीम में सीमित संख्या में खिलाड़ी ही अंतिम टीम का हिस्सा बन पाते हैं। ऐसे में हजारों खिलाड़ियों में से बड़ी संख्या को घरेलू क्रिकेट के सबसे बड़े मंच तक पहुंचने का मौका नहीं मिल पाता। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी लंबे समय तक चयन प्रक्रिया में बने रहने के बावजूद टीम में जगह नहीं बना पाते। कुछ खिलाड़ी दूसरे राज्यों, रेलवे या सर्विसेज की टीमों का रुख भी करते हैं। ऐसे में समर्थकों का मानना है कि अगर उत्तर प्रदेश की एक से अधिक टीमें होंगी तो स्थानीय प्रतिभाओं के लिए अवसरों का दायरा बढ़ेगा।

क्षेत्रीय टीमों से बदल सकता है क्रिकेट का ढांचा

अगर भविष्य में उत्तर प्रदेश में बहु-टीम मॉडल को मंजूरी मिलती है तो अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी टीमें हो सकती हैं। उदाहरण के तौर पर पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और बुंदेलखंड को अलग-अलग क्रिकेट इकाइयों के तौर पर विकसित करने का विचार रखा जा रहा है। इससे सिर्फ खिलाड़ियों को ही फायदा नहीं होगा, बल्कि कोच, सपोर्ट स्टाफ, चयनकर्ता, ग्राउंड स्टाफ और क्रिकेट प्रशासन से जुड़े लोगों के लिए भी अवसर बढ़ सकते हैं।

लेकिन फैसला इतना आसान भी नहीं

हालांकि यूपी में एक से ज्यादा रणजी टीमों की मांग लगातार चर्चा में है, लेकिन इसे लागू करने के लिए बीसीसीआई के घरेलू क्रिकेट ढांचे और नियमों में बदलाव की जरूरत होगी। किसी भी राज्य को नई टीमों के लिए मान्यता देने का फैसला कई प्रशासनिक और क्रिकेटिंग मानकों पर निर्भर करता है। यही वजह है कि फिलहाल यह मांग बहस और चर्चा के स्तर पर है। लेकिन जिस तेजी से उत्तर प्रदेश में क्रिकेट का विस्तार हो रहा है, आने वाले समय में यह सवाल और बड़ा हो सकता है कि क्या इतने विशाल राज्य की क्रिकेट प्रतिभाओं के लिए सिर्फ एक रणजी टीम पर्याप्त है?

असली सवाल प्रतिभा का है

उत्तर प्रदेश में प्रतिभा की कमी नहीं है। चुनौती यह है कि उस प्रतिभा को बड़े मंच तक पहुंचने के कितने मौके मिलते हैं। अगर बहु-टीम मॉडल पर गंभीरता से विचार होता है, तो इसका सबसे बड़ा फायदा उन युवा क्रिकेटरों को मिल सकता है जिन्हें फिलहाल सीमित सीटों के कारण अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। अब नजर इस बात पर है कि उत्तर प्रदेश की इस मांग को बीसीसीआई और क्रिकेट के दूसरे जिम्मेदार संस्थान भविष्य में किस नजरिए से देखते हैं।

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