आज के डिजिटल युग में अधिकांश लोग सुबह आंख खुलते ही और रात को सोने से पहले मोबाइल स्क्रीन पर घंटों बिताते हैं। सोशल मीडिया, न्यूज़ ऐप्स और वीडियो प्लेटफॉर्म पर लगातार नकारात्मक खबरें, विवाद, अपराध, युद्ध, आर्थिक संकट और दुर्घटनाओं से जुड़ी सामग्री देखते रहने की आदत को “डूम स्क्रॉलिंग” कहा जाता है। यह एक ऐसी आदत है जो धीरे-धीरे व्यक्ति की मानसिक शांति, उत्पादकता और स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
क्या है डूम स्क्रॉलिंग?
डूम स्क्रॉलिंग वह आदत है, जिसमें व्यक्ति अपने मोबाइल या लैपटॉप पर घंटों तक लगातार नकारात्मक, डरावनी और तनाव बढ़ाने वाली खबरें, वीडियो और सोशल मीडिया पोस्ट देखता रहता है। हैरानी की बात यह है कि कई बार उसे पता होता है कि यह कंटेंट उसकी चिंता और बेचैनी बढ़ा रहा है, फिर भी वह स्क्रॉल करना बंद नहीं कर पाता। धीरे-धीरे यह आदत एक ऐसे डिजिटल जाल में बदल जाती है, जो व्यक्ति की मानसिक शांति, नींद और भावनात्मक संतुलन को प्रभावित करने लगती है। विशेषज्ञ इसे आधुनिक दौर की एक “साइलेंट डिजिटल एडिक्शन” मानते हैं, जो लोगों को बिना एहसास कराए तनाव, डर और नकारात्मकता के चक्र में फसा सकती है।
लोग डूम स्क्रॉलिंग क्यों करते हैं?
लोग अक्सर जानकारी हासिल करने के इरादे से शुरुआत करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह एक ऐसे चक्र में बदल जाता है जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।हर अपडेट से जुड़े रहने की चाह: लोगों को लगता है कि अगर उन्होंने फोन नहीं देखा तो कोई बड़ी खबर या महत्वपूर्ण जानकारी छूट जाएगी। -FOMO (Fear of Missing Out): कुछ महत्वपूर्ण छूट जाने का डर लोगों को बार-बार सोशल मीडिया और न्यूज़ फीड चेक करने के लिए मजबूर करता है।
एल्गोरिदम का जाल
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे कंटेंट को बार-बार दिखाते हैं जिस पर लोग ज्यादा समय बिताते हैं। एक बार किसी नकारात्मक खबर पर रुके, तो उसी तरह की दर्जनों खबरें स्क्रीन पर आने लगती हैं।
-तनाव और अकेलेपन से बचने की कोशिश: कई लोग मानसिक तनाव, बोरियत या अकेलेपन से ध्यान हटाने के लिए फोन उठाते हैं, लेकिन नकारात्मक कंटेंट उन्हें और अधिक चिंता और बेचैनी में धकेल देता है।
-दिमाग का ‘खतरे’ की ओर आकर्षण: मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, इंसानी दिमाग स्वाभाविक रूप से खतरों और नकारात्मक सूचनाओं पर ज्यादा ध्यान देता है। यही वजह है कि बुरी खबरें अक्सर अच्छी खबरों की तुलना में अधिक आकर्षित करती हैं।
डूम स्क्रॉलिंग के फायदे
हालांकि इसके नुकसान अधिक हैं, फिर भी कुछ सीमित फायदे हो सकते हैं:
-दुनिया की घटनाओं की जानकारी मिलती है।
-सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ती है।
-आपातकालीन या महत्वपूर्ण सूचनाएं समय पर मिल सकती हैं।
-कुछ मामलों में लोगों को सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय होने के लिए प्रेरित कर सकती है।
डूम स्क्रॉलिंग के नुकसान
-बढ़ती चिंता और तनाव
लगातार नकारात्मक खबरें देखने से दिमाग खतरे की स्थिति में रहने लगता है। इससे चिंता, घबराहट और तनाव बढ़ सकता है।
– अवसाद का खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार नकारात्मक जानकारी के संपर्क में रहने से व्यक्ति में निराशा और असहायता की भावना बढ़ सकती है।
– नींद पर बुरा असर
रात में घंटों तक स्क्रॉलिंग करने से नींद की गुणवत्ता खराब होती है। स्क्रीन की नीली रोशनी और तनावपूर्ण कंटेंट दिमाग को आराम नहीं करने देते।
– शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
•आंखों में दर्द
•सिरदर्द
•गर्दन और पीठ में दर्द
•शारीरिक गतिविधियों में कमी
-दुनिया के प्रति नकारात्मक नजरिया
डूम स्क्रॉलिंग से ऐसा लगने लगता है कि दुनिया में सिर्फ बुरी घटनाएं ही हो रही हैं, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक संतुलित होती है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई लोग इस आदत को पहचान ही नहीं पाते। उन्हें लगता है कि वे सिर्फ “जानकारी ले रहे हैं”, जबकि वास्तव में वे मानसिक थकान और तनाव के चक्र में फंस चुके होते हैं।
डूम स्क्रॉलिंग से कैसे बचें?
सोशल मीडिया के लिए समय सीमा तय करें।
सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन बंद करें।
केवल विश्वसनीय स्रोतों से खबरें पढ़ें।
नकारात्मक खबरों के बीच सकारात्मक कंटेंट भी देखें।
ऑफलाइन गतिविधियों को समय दें।
डूम स्क्रॉलिंग सिर्फ एक ऑनलाइन आदत नहीं, बल्कि आधुनिक समय की एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही है। जानकारी रखना जरूरी है, लेकिन अगर खबरें और सोशल मीडिया आपकी नींद, मानसिक शांति और खुशियों को प्रभावित करने लगें, तो यह चेतावनी का संकेत है।

