कभी-कभी राजनीति में दो कदम पीछे हटकर तीन कदम आगे चलना फायदेमंद होता है। इसी तरह का गेम बीजेपी इस बार खेलने जा रही है। बीजेपी का अगला निशाना यूपी में जीत की हैट्रिक लगाना है। दूसरी तरफ सहयोगी दलों को खुश रखना भी मुश्किल दांव-पेच है।
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और इससे पहले ही प्रदेश की सियासत में हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी इस बार पिछले चार विधानसभा चुनावों की तुलना में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। अगर यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह भाजपा की चुनावी रणनीति के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
चर्चा है कि भाजपा इस बार अपने सहयोगी दलों के लिए करीब 80 सीटें छोड़ सकती है, जबकि पार्टी खुद बची हुई करीब 323 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को मैदान में उतारेंगी। अगर यह समीकरण अंतिम रूप लेता है, तो यह वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में हुए सीट बंटवारे से अलग तस्वीर पेश करेगा। उस समय भाजपा ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर जिस तरह सीटों का तालमेल बिठाया था, इस बार गठबंधन के भीतर सीटों का यह बंटवारा कहीं अधिक बड़ा और महत्वपूर्ण नजर आ रहा है।
भाजपा ने पिछली बार अपने सहयोगी दलों अपना दल, निषाद पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपना दल को 17 निषाद पार्टी को 10 सीटें दी थी। वहीं सुभासपा और रालोद ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन इस बार रालोद और सुभासपा दोनों एनडीए का हिस्सा हैं। इन दोनों पार्टियों का सीट शेयर 52 रहा था। इस बार भाजपा के लिए इन दोनों पार्टियों को साधना बड़ी चुनौती होगा।
फिलहाल उत्तर प्रदेश में भाजपा के गठबंधन यानी एनडीए में राष्ट्रीय लोक दल, अपना दल, निषाद पार्टी और सुभासपा जैसे प्रमुख सहयोगी दल शामिल हैं। इन सभी दलों का अपने-अपने क्षेत्रों और जातीय समीकरणों में खासा प्रभाव माना जाता है, यही वजह है कि भाजपा गठबंधन धर्म निभाते हुए इन दलों को इस बार भी साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम कर सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा हर सीट पर सबसे मजबूत और जिताऊ उम्मीदवार को मैदान में उतारना चाहती है। पार्टी की कोशिश है कि गठबंधन के भीतर तालमेल इतना मजबूत हो कि विपक्ष को कहीं भी बढ़त बनाने का मौका न मिल सके। हालांकि सीटों के इस बंटवारे को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है और यह पूरा समीकरण आने वाले महीनों में होने वाली बातचीत और रणनीतिक फैसलों पर निर्भर करेगा।
फिलहाल यह पूरा सीट बंटवारा सिर्फ चर्चाओं और अटकलों के स्तर पर ही है और भाजपा की ओर से इस पर अंतिम मुहर लगना अभी बाकी है। ऐसे में आने वाले दिनों में पार्टी और उसके सहयोगी दलों के बीच होने वाली बैठकों पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों में सीट बंटवारे की असली तस्वीर भाजपा हाईकमान के हाथ में है।
पिछली बार की बात करें तो भाजपा के सहयोगी दलों ने 80 सीटों पर चुनाव लड़ा था। भाजपा ने स्वयं 376 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन इस बार राष्ट्रीय लोकदल भी एनडीए का हिस्सा है। गौरतलब है कि पिछली बार रालोद का सपा के साथ गठबंधन था और वह 33 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। जिसमें से वह 8 सीटों पर जीत दर्ज कर पाई थी। इस बार वह एनडीए का हिस्सा है। माना जा रहा है कि रालोद अपने लिए भाजपा से 33 सीटों की मांग कर सकती है। तब भाजपा को अपने लिए सीमित सीटों पर चुनाव लड़ना होगा।
रिपोर्ट-सोनू सिंह

