हाल ही में ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने कांवड़ यात्रा को लेकर एक बेहद विवादित बयान दिया है, जिसने देशभर में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। मौलाना रशीदी ने कांवड़ यात्रा में शामिल होने वाले लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें ‘गंजेड़ी’, ‘भंगेड़ी’ और ‘आतंकवादी’ तक करार दिया है। इस बयान के सामने आने के बाद से ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।
कांवड़ियों पर मौलाना की टिप्पणी से मचा सियासी बवाल
मौलाना साजिद रशीदी ने अपने बयान में तर्क दिया कि सावन के पवित्र महीने में कांवड़ लेकर चलने वाले सभी लोग सच्चे शिवभक्त नहीं होते। उन्होंने आरोप लगाया कि कांवड़ यात्रा के नाम पर सड़क पर बैठकर भांग और नशीले पदार्थों का सेवन करना, वर्दीधारी पुलिसकर्मियों से बदसलूकी करना और लूटपाट जैसी घटनाएं करना आम हो गया है। मौलाना का कहना है कि ऐसे असामाजिक तत्वों को ‘शिवभक्त’ कहना भगवान शिव का अपमान है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे सभी कांवड़ियों को गलत नहीं मानते, लेकिन उपद्रव करने वाले लोगों की श्रेणी वे ‘आतंकवादी’ के समान रखते हैं।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर साधा निशाना
इस विवादित बयान के दौरान मौलाना रशीदी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पुराने बयानों का भी जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि जब सीएम योगी ने सार्वजनिक स्थानों या चौराहों पर नमाज पढ़ने को लेकर आपत्ति जताई थी और उसे ‘तमाशा’ कहा था, तो प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई की थी। मौलाना ने अब वही सवाल मुख्यमंत्री के सामने खड़ा किया है कि क्या सड़क पर नशा करके उपद्रव मचाने वाले ये लोग समाज के लिए ‘तमाशा’ नहीं हैं? उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि जिस तरह नमाज को लेकर सख्ती बरती जाती है, वैसा ही रुख इन उपद्रवी कांवड़ियों के खिलाफ भी अपनाया जाना चाहिए।
लचीला रुख
हालाँकि, मौलाना ने अपने बयान में एक लचीला रुख अपनाते हुए यह भी जोड़ा कि वे सभी कांवड़ियों के विरोधी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यात्रा में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो पूरी श्रद्धा और शांति के साथ अपनी यात्रा पूरी करते हैं, और उन्हें वे सच्चे शिवभक्त मानते हैं। लेकिन, उन्होंने अपनी नाराजगी उन लोगों के प्रति व्यक्त की है जो आस्था की आड़ में कानून को अपने हाथ में लेते हैं और आम जनता को परेशानी में डालते हैं।
समाज में बढ़ रही धार्मिक असहजता
मौलाना का यह बयान ऐसे समय पर आया है जब देश में धार्मिक यात्राओं और उनके प्रबंधन को लेकर पहले ही संवेदनशीलता बनी हुई है। समाज के कुछ वर्ग मौलाना के इस बयान को धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाला बता रहे हैं, तो वहीं कुछ लोग उन घटनाओं पर चिंता जता रहे हैं जिनका जिक्र उन्होंने अपने बयान में किया है। बहरहाल, इस बयान ने एक बार फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आस्था की आड़ में किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता को जायज ठहराया जा सकता है?
प्रशासन और कानून की भूमिका पर सवाल
इस मामले ने प्रशासन की भूमिका को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। कांवड़ यात्रा के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस और प्रशासन की बड़ी चुनौती होती है। मौलाना रशीदी का यह बयान एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है कि अगर यात्रा के दौरान असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो यह समाज में सांप्रदायिक और धार्मिक तनाव को और बढ़ा सकता है। अब देखना यह होगा कि इस बयान के बाद प्रशासन की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं और इस विवाद पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं क्या रुख अख्तियार करती हैं।

