उत्तर प्रदेश के गांवों, खेतों की मेड़ों और पुराने बाग-बगीचों में कभी आसानी से नजर आने वाले कई पेड़-पौधे अब धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। बदलती जीवनशैली, तेजी से बढ़ते शहरीकरण, पेड़ों की कटाई और प्राकृतिक परिस्थितियों में बदलाव के कारण स्थानीय प्रजातियों का दायरा लगातार सिमट रहा है। अब वन विभाग ने ऐसी पारंपरिक और स्थानीय महत्व वाली प्रजातियों को दोबारा जमीन पर उतारने की तैयारी शुरू की है।
वन विभाग की योजना के तहत प्रदेश में उन पेड़-पौधों की पहचान की जाएगी, जिनका स्थानीय पर्यावरण, जैव विविधता, औषधीय उपयोग या ग्रामीण जीवन से पुराना संबंध रहा है, लेकिन समय के साथ उनका प्राकृतिक प्रसार कम हो गया है। इन प्रजातियों के बीज और रोपण सामग्री जुटाकर विभागीय नर्सरियों में पौध तैयार की जाएगी। इसके बाद इन्हें उनके अनुकूल क्षेत्रों में लगाया जाएगा, ताकि इनका अस्तित्व आने वाली पीढ़ियों तक बना रहे।
इस पहल में कैथा, खिरनी और बड़हल जैसे ऐसे पेड़-पौधे शामिल किए जा रहे हैं, जो कभी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में आम दिखाई देते थे। इन पेड़ों का संबंध सिर्फ हरियाली से नहीं रहा, बल्कि स्थानीय खान-पान, पारंपरिक उपयोग और ग्रामीण संस्कृति में भी इनकी अपनी जगह रही है। समय के साथ इन प्रजातियों की संख्या घटती गई। कई जगहों पर नई पीढ़ी के लोग इन पेड़ों को पहचान तक नहीं पाते। ऐसे में वन विभाग का उद्देश्य सिर्फ पौधे लगाना नहीं, बल्कि उन प्रजातियों को उनके पुराने प्राकृतिक वातावरण में दोबारा स्थापित करना है।
विभाग की योजना में पूरे प्रदेश के लिए एक जैसी प्रजातियां तय करने के बजाय क्षेत्रवार पहचान पर जोर दिया जाएगा। जिस इलाके की मिट्टी, जलवायु और प्राकृतिक परिस्थितियों में कोई खास प्रजाति पहले से पाई जाती रही है, वहां उसी प्रजाति को प्राथमिकता दी जाएगी। इसके लिए स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाई जाएगी और यह देखा जाएगा कि किसी क्षेत्र में कौन से पेड़-पौधे पहले बड़ी संख्या में पाए जाते थे और अब उनकी संख्या कम हो गई है। स्थानीय लोगों, ग्रामीणों और वन विभाग के कर्मचारियों से मिलने वाली जानकारी भी इस प्रक्रिया में उपयोगी हो सकती है।
चिह्नित प्रजातियों के बीज, फल, कलम या दूसरी रोपण सामग्री जुटाकर विभागीय नर्सरियों में पौध तैयार की जाएगी। पौध को मजबूत करने के बाद उन्हें संबंधित क्षेत्रों में लगाया जाएगा।
इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ पौध तैयार करना ही लक्ष्य नहीं होगा। पौधे लगाए जाने के बाद उनकी देखभाल और निगरानी भी जरूरी होगी, ताकि नई पौध शुरुआती वर्षों में सुरक्षित रह सके। विभाग की कोशिश रहेगी कि ऐसी जगहों का चयन किया जाए जहां पौधों को बढ़ने के लिए अनुकूल वातावरण मिल सके।
स्थानीय पेड़-पौधों की प्रजातियां किसी एक पेड़ तक सीमित नहीं होतीं। इनके साथ पक्षियों, कीटों और दूसरे छोटे जीवों का भी संबंध होता है। किसी स्थानीय प्रजाति के कम होने का असर पूरे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। ऐसे में पुराने और स्थानीय पेड़ों को फिर से बढ़ावा मिलने से जैव विविधता को भी फायदा मिल सकता है। कई पेड़ पक्षियों को भोजन और आश्रय देते हैं, जबकि कुछ प्रजातियां मिट्टी और स्थानीय पर्यावरण के लिए भी उपयोगी मानी जाती हैं।
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उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में कई पेड़ सिर्फ प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रहे हैं। कुछ पेड़ों के फल खाए जाते थे, कुछ का इस्तेमाल घरेलू जरूरतों में होता था और कई पेड़ गांव की पहचान का हिस्सा माने जाते थे। बदलते दौर में ऐसे पेड़ों की जगह तेजी से बढ़ने वाली या व्यावसायिक प्रजातियों ने ले ली। इसका असर ग्रामीण परिदृश्य पर भी दिखाई देता है। अगर कैथा, खिरनी, बड़हल जैसी प्रजातियों को दोबारा बड़े स्तर पर लगाया जाता है, तो आने वाले समय में गांवों और कस्बों में पुराने पेड़ों की हरियाली फिर दिखाई दे सकती है।
वन विभाग की इस पहल का एक बड़ा हिस्सा संरक्षण से जुड़ा है। केवल पौधे लगा देने से किसी विलुप्तप्राय या कम होती प्रजाति को बचाना संभव नहीं है। उसके लिए लगातार देखभाल, उचित जगह, पर्याप्त पानी और प्राकृतिक रूप से बढ़ने का मौका देना भी जरूरी है। इसी वजह से योजना में पौध तैयार करने के साथ उनके संरक्षण और संवर्धन पर भी जोर दिया जा रहा है। विभाग यह कोशिश करेगा कि जिन क्षेत्रों में इन प्रजातियों को लगाया जाए, वहां उनका भविष्य में भी विस्तार हो और वे सिर्फ एक-दो जगहों तक सीमित न रह जाएं।
इस पहल का एक मकसद स्थानीय पेड़-पौधों की जानकारी को भी जिंदा रखना है। आज कई पारंपरिक प्रजातियां ऐसी हैं, जिनके नाम और उपयोग धीरे-धीरे लोगों की यादों से बाहर होते जा रहे हैं। अगर इन्हें दोबारा सार्वजनिक स्थानों, गांवों, स्कूलों, संस्थानों और उपयुक्त वन क्षेत्रों में लगाया जाता है, तो नई पीढ़ी भी इनके बारे में जान सकेगी। उत्तर प्रदेश में अलग-अलग भौगोलिक और जलवायु वाले इलाके हैं। ऐसे में यहां स्थानीय वनस्पतियों की विविधता भी काफी व्यापक है।
वन विभाग की यह योजना अगर जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश के कई हिस्सों में उन पेड़-पौधों की वापसी देखने को मिल सकती है, जो कभी स्थानीय जीवन और पर्यावरण का हिस्सा हुआ करते थे। कैथा-खिरनी से लेकर बड़हल तक की इन प्रजातियों को फिर से बढ़ावा देने की कोशिश सिर्फ हरियाली बढ़ाने की कवायद नहीं है। यह प्रदेश की उस प्राकृतिक विरासत को बचाने की पहल भी है, जो धीरे-धीरे लोगों की नजरों से ओझल होती जा रही है।


