Fast Track Courts: बलात्कार और बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों में पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने के लिए बनाए गए फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट अब खुद मामलों के भारी बोझ से जूझ रहे हैं। जिन अदालतों का उद्देश्य ऐसे मामलों की सुनवाई तेजी से पूरी करना था, वहां लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। 31 दिसंबर 2025 तक देशभर में फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट में करीब 2.5 लाख मामले लंबित थे। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब इन अदालतों से उम्मीद की जाती है कि वे रेप और POCSO Act से जुड़े मामलों का ट्रायल तेजी से पूरा करें और पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाएं।
2025 में 1.4 लाख से ज्यादा मामले दर्ज, निपटे सिर्फ 66,500
आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में देशभर में रेप और POCSO से जुड़े 1.4 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए। हालांकि, इसी अवधि में Fast Track Courts करीब 66,500 मामलों का ही निपटारा कर सके। इसका सीधा असर लंबित मामलों पर पड़ा। नए मामलों की संख्या लगातार बढ़ती रही, लेकिन अदालतों में मामलों के निपटारे की रफ्तार उस अनुपात में नहीं बढ़ सकी।
नतीजा यह हुआ कि मामलों का बैकलॉग लगातार जमा होता गया। हर लंबित मामले के पीछे एक पीड़ित, एक परिवार और लंबे समय से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे लोग हैं। ऐसे मामलों में देरी केवल कानूनी प्रक्रिया को लंबा नहीं करती, बल्कि पीड़ितों और उनके परिवारों पर मानसिक और सामाजिक दबाव भी बढ़ाती है।
सात साल बाद भी पेंडेंसी 2 लाख से ऊपर
Fast Track Courts की शुरुआत 2019 में इस उद्देश्य से की गई थी कि यौन अपराधों से जुड़े गंभीर मामलों की सुनवाई सामान्य अदालतों की तुलना में तेजी से पूरी हो सके। लेकिन पिछले करीब सात वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि लंबित मामलों की संख्या लगातार 2 लाख से ऊपर बनी हुई है। पिछले तीन वर्षों में भी स्थिति में कोई बड़ा सुधार देखने को नहीं मिला।
अदालतों में मामलों का निपटारा जरूर हुआ, लेकिन नए मामलों की संख्या और पुराने लंबित मामलों के कारण पेंडेंसी का आंकड़ा कम नहीं हो सका। यानी जिस व्यवस्था को ‘फास्ट-ट्रैक’ बनाकर तैयार किया गया था, वह बढ़ते केस लोड के कारण अपेक्षित गति हासिल नहीं कर पा रही है।
एक साल में ट्रायल पूरा करने का लक्ष्य
योजना के तहत रेप और POCSO Act से जुड़े मामलों का ट्रायल जल्द से जल्द पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। योजना का उद्देश्य यह है कि ऐसे मामलों को सालों तक अदालतों में लंबित न रहना पड़े। लेकिन जमीनी स्थिति यह है कि मामलों की बढ़ती संख्या, अदालतों पर काम का दबाव और सुनवाई की लंबी प्रक्रिया के कारण कई मामलों में समयबद्ध सुनवाई का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है।
योजना को दो बार बढ़ाया गया
Fast Track Courts योजना को अब तक दो बार आगे बढ़ाया जा चुका है। योजना के तहत देशभर में 790 फास्ट-ट्रैक स्पेशल कोर्ट स्थापित करने का प्रावधान है। इसका आखिरी विस्तार 31 मार्च 2026 तक था। इन अदालतों से उम्मीद की गई थी कि वे यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई में तेजी लाएंगी और लंबित मामलों को जल्द से जल्द खत्म करेंगी। हालांकि, लगातार बढ़ती पेंडेंसी ने इस व्यवस्था की क्षमता और संसाधनों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
अदालतों की संख्या बढ़ाना ही काफी नहीं
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ Fast Track Courts की संख्या बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अदालतों में पर्याप्त जज, सरकारी वकील, जांच अधिकारी और कोर्ट स्टाफ की उपलब्धता भी जरूरी है। कई बार जांच में देरी, गवाहों की अनुपस्थिति, बार-बार स्थगन और अन्य प्रक्रियात्मक कारणों से सुनवाई लंबी खिंचती रहती है। ऐसे में अदालतों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ पूरी न्यायिक प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने की जरूरत है।
पीड़ितों के लिए जल्द न्याय सबसे बड़ी जरूरत
रेप और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में समय पर न्याय बेहद महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक चलने वाली सुनवाई पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए बेहद कठिन अनुभव बन सकती है। Fast Track Courts का मूल उद्देश्य यही था कि ऐसे मामलों में न्याय में अनावश्यक देरी न हो। लेकिन करीब 2.5 लाख लंबित मामलों का आंकड़ा बताता है कि इस व्यवस्था को और मजबूत करने की तत्काल जरूरत है।
क्या सरकार और न्यायपालिका मिलकर इन अदालतों की क्षमता बढ़ाने, खाली पदों को भरने और मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के लिए ठोस कदम उठाएंगे? क्योंकि Fast Track Courts का मतलब सिर्फ नाम में तेज अदालतें नहीं, बल्कि पीड़ितों को वास्तव में जल्द न्याय मिलना होना चाहिए।


