उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले में हिंडन नदी के किनारे बसा सुराणा गांव आज भले ही एक साधारण गांव जैसा दिखता हो, लेकिन इसकी मिट्टी में सदियों पुरानी वीरता और त्याग की एक ऐसी कहानी दफन है, जिसे सुनकर आंखें नम हो जाती हैं। यहां रहने वाले छाबड़िया गोत्र के यदुवंशी अहीर परिवार आज भी अपने पुरखों की उस कुर्बानी को दिल से याद करते हैं, जिसने पूरे गांव की तकदीर बदल दी थी।
मान्यता है कि 1192 ईस्वी के आसपास, जब पृथ्वीराज चौहान के वंशज संकट में घिरे थे, तो वे सुराणा के अहीरों के पास शरण मांगने पहुंचे। क्षत्रिय धर्म और शरणागत रक्षा की परंपरा में विश्वास रखने वाले गांव के वीरों ने बिना किसी हिचकिचाहट के उन्हें अपने गांव में शरण दे दी। यह सिर्फ एक फैसला नहीं था, बल्कि यह एक ऐसा वचन था जिसकी कीमत पूरे गांव ने अपनी जान देकर चुकाई।
जब मोहम्मद गौरी को इस बात की भनक लगी, तो उसने विशाल भेजकर सुराणा पर आक्रमण कर दिया। अहीर रणबांकुरों ने अपनी जान की परवाह किए बिना डटकर मुकाबला किया। भयंकर युद्ध हुआ, इस दौरान उन्होंने पृथ्वीराज चौहान के वंशजों का ठिकाना बताने से साफ इनकार कर दिया और अंत में लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गए। कहा जाता है कि यह हृदयविदारक हमला रक्षाबंधन के दिन हुआ था, जिसमें गांव के अधिकांश पुरुष शहीद हो गए और पूरा गांव उजड़ गया।
इस दिन पूरे गांव में मातम छाया हुआ था। आज भी सुराणा और आसपास के कुछ यदुवंशी परिवार रक्षाबंधन को शुभ पर्व के बजाय अपशकुन मानते हैं और इसे नहीं मनाते। समय के साथ राजवती देवी के पुत्रों ने उजड़े हुए सुराणा को दोबारा बसाया, लेकिन गांव में आज भी मौजूद पुरानी हवेलियों के खंडहर उस बलिदान की गवाही देते हैं।
रिपोर्ट- सोनू सिंह

