लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। राज्य में बीजेपी के मुस्लिम चेहरा रहे मोहसिन रजा (Mohsin Raza) को बीजेपी ने अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया है। उन्हें अब कैनिट रैंक का दर्जा भी मिलेगा. बता दें कि मोहसिन रजा शिया मुस्लिम समुदाय के उच्च वर्ग (अशरफ) से आते हैं।
मोहसिन रजा पहले भी यूपी सरकार में मुस्लिम वक्फ और हज विभाग के मंत्री रह चुके हैं लेकिन उन्हें अभी ये पद देना चुनाव के लिहाज से मायने रखता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस चुनाव में बीजेपी की नजर राज्य के मुस्लिम वोटों पर है। क्या अब तक बीजेपी से खफा रहने वाले मुस्लिम समुदाय के वोटरों का बीजेपी के लिए दिल पिघलेगा।
मंसूर, अली के बाद अब नकवी की नियुक्ति के मायने ?
ये सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि हाल के दिनों में बीजेपी ने कई ऐसे फैसले लिए है जिससे यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि बीजेपी सिर्फ हिन्दुत्व के लिए नहीं बल्कि अल्पसंख्यकों के लिए भी सोचती है। अभी बीते अगस्त महीने में ही बीजेपी के राष्ट्रीय टीम में दो मुस्लिम चेहरों को अहम पद दिए गए हैं। डॉक्टर तारिक मंसूर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद दिया गया है, वो विधान परिषद के सदस्य भी हैं और पसमांदा (कुरैशी बिरादरी) मुसलमान हैं। उन्हें योगी आदित्यनाथ ने मनोनीत किया था।
वहीं कुंवर बासित अली को बीजेपी ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक मोर्चे की जिम्मेदारी दी है। वो मुस्लिम राजपूत समुदाय से आते हैं लेकिन पसमांदा समुदाय में भी वो खूब लोकप्रिय हैं। खास बात ये है कि ये दोनों ही नेता उत्तर प्रदेश से हैं और आगामी यूपी चुनाव में मुस्लिम वोटों को बीजेपी के पाले में लाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
बीजेपी और सरकार में इन मुस्लिम नेताओं की नियुक्ति को बीजेपी और अल्पसंख्यक वोटरों के बीच विश्वास की जो खाई है उसे पाटने और संवाद बढ़ाने के लिए अहम माना जा रहा है। मोहसिन रजा की नियुक्ति को भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है. ऐसे में सबसे पहले यूपी के मुस्लिम वोटों के समीकरण को समझना जरूरी है।
यूपी में क्या है मुस्लिम वोटों का समीकरण
साल 2011 की जनसंख्या के मुताबिक यूपी में करीब 19 से 20 फीसदी मुस्लिम आबादी है। बीते पंद्रह सालों में इस आबादी के बढ़कर 25 फीसदी हो जाने का अनुमान लगाया गया है। कई रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है यूपी के 226 शहरों में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी के पार है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड, पूर्वांचल के जिलों जैसे कैराना, देवबंद, नगीना, मुरादाबाद, रामपुर, मेरठ के कई इलाकों में इनकी आबादी बहुतायत है और यही चुनाव में हार जीत का अंतर तय करते हैं।
यूपी के मुस्लिमों को लेकर एक आम समझ ये भी है कि ये पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े वोटर हैं और राज्य में इनकी आबादी का 79 से 83 फीसदी वोट अकेले समाजवादी पार्टी को मिलता है। इसलिए समाजवादी पार्टी पर बीजेपी कई बार मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप भी लगाती है. वहीं अखिलेश यादव भी अपने पीडीए फॉर्मूले में ए को अल्पसंख्यक बता चुके हैं।
मुस्लिम वोट प्रतिशत बढ़ाने की जुगत में बीजेपी
अब मुस्लिमों को पार्टी से जोड़ने की बीजेपी की कोशिश को और बेहतर समझने के लिए हमें तीन साल पीछे जाना होगा। दरअसल साल 2023 में उत्तर प्रदेश में नगर निकाय के चुनाव हुए थे जिसमें पार्टी ने 395 मुस्लिम चेहरों को टिकट देकर चुनाव में उतारा था. इन उम्मीदवारों में 90 फीसदी पसमांदा (यानी पिछड़े मुस्लिम वर्ग) से थे. इनमें से 40 से 45 उम्मीदवार चुनाव में विजयी रहे थे।
इसी चुनाव और इसके नतीजों से उत्साहित होकर बीजेपी अब विधानसभा चुनाव अपने मुस्लिम वोटों की हिस्सेदारी को बढ़ाने की कोशिश कर रही है ताकि ज्यादा सीटों पर जीत सुनिश्चित की जा सके। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को यूपी में 8 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे जिसमें 2017 के मुकाबले बढ़ोतरी हुई थी।
इसमें मुस्लिम महिला वोटरों ने अहम भूमिका निभाई थी क्योंकि उन्हें तीन तलाक जैसे कुप्रथा से कानूनी सुरक्षा मिली थी। अब बीजेपी मुस्लिम वोट शेयर को दोहरे अंकों में ले जाना चाहती है जिससे इन नियुक्तियों को जोड़कर देखा जा रहा है।
रिपोर्ट: कुणाल कौशल


