मेरठ: एक ऐसे मामले का फैसला सामने आया है, जिसने न्याय व्यवस्था और लंबे समय तक जेल में रहने वाले एक व्यक्ति की जिंदगी पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मेरठ के लिसाड़ीगेट क्षेत्र के रहने वाले शाहनवाज उर्फ टूटा को करीब आठ साल बाद अदालत ने बरी कर दिया। उस पर जानलेवा हमले का मुकदमा दर्ज हुआ था और आरोप था कि उसने एक रेस्टोरेंट संचालक पर गोली चलाई थी। हालांकि, मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और पुख्ता साक्ष्य पेश नहीं हो सके।
शाहनवाज के लिए यह मामला सिर्फ अदालत की तारीखों तक सीमित नहीं रहा। मुकदमा दर्ज होने के बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। बताया गया कि आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि वह अपनी पैरवी के लिए निजी वकील तक नहीं कर सका। जमानत का इंतजाम भी नहीं हो पाया और देखते ही देखते करीब आठ साल उसकी जिंदगी जेल की चारदीवारी के भीतर गुजर गए।
2018 में दर्ज हुआ था जानलेवा हमले का मुकदमा
मामला 24 जून 2018 का है। शाहपीर गेट इलाके में रेस्टोरेंट चलाने वाले तैयब ने लिसाड़ीगेट थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के मुताबिक, घटना शाम करीब 7:45 बजे की थी। तैयब उस समय रेस्टोरेंट के कैश काउंटर पर बैठा हुआ था। आरोप था कि इसी दौरान एक व्यक्ति रेस्टोरेंट में पहुंचा और उसने बिरयानी मांगी। तैयब ने उसे बताया कि उस समय बिरयानी खत्म हो चुकी है। आरोप के मुताबिक, बिरयानी नहीं मिलने की बात सुनकर वह व्यक्ति नाराज हो गया और उसने जान से मारने की नीयत से गोली चला दी।
शिकायत में बताया गया कि गोली तैयब के कंधे को छूते हुए निकल गई। घटना के बाद इलाके में हड़कंप मच गया। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और शाहनवाज उर्फ टूटा को आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद उसे जेल भेज दिया गया।
आठ साल तक जेल में रहा शाहनवाज
मुकदमा दर्ज होने के बाद शाहनवाज की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। वह लगातार जेल में रहा और अदालत में मामले की सुनवाई चलती रही। इस दौरान उसकी आर्थिक स्थिति उसके लिए बड़ी परेशानी बनी रही। उसके पास निजी वकील की फीस देने के लिए भी पैसे नहीं थे। आर्थिक तंगी के कारण वह अपनी मजबूत कानूनी पैरवी नहीं कर पाया। बताया गया कि मामले में उसे एक बार भी जमानत नहीं मिल सकी। ऐसे में जिस मुकदमे का फैसला कुछ समय बाद होना था, उसकी सुनवाई लंबी खिंचती चली गई और शाहनवाज के करीब आठ साल जेल में गुजर गए।
एक व्यक्ति के लिए आठ साल का समय कितना बड़ा होता है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस दौरान उसकी जिंदगी के कई साल अदालत और जेल के बीच बीत गए। परिवार से दूरी, रोजमर्रा की जिंदगी से कटाव और भविष्य को लेकर अनिश्चितता उसके लिए अलग चुनौती रही होगी।
न्याय मित्र ने संभाली शाहनवाज की पैरवी
मामले की सुनवाई के दौरान शाहनवाज की ओर से न्याय मित्र ने उसकी पैरवी की। न्याय मित्र की ओर से अदालत के सामने मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों को रखा गया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त पुख्ता साक्ष्य अदालत के सामने नहीं आ सके। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और मामले में पेश किए गए साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद शाहनवाज को दोषी नहीं माना। इसके बाद अदालत ने उसे बरी करने का फैसला सुनाया।
अदालत में आरोप साबित नहीं हो सके
किसी भी आपराधिक मामले में केवल आरोप लगना किसी व्यक्ति को दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं होता। दोष साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को अदालत के सामने विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य पेश करने होते हैं। इस मामले में भी अदालत के सामने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर शाहनवाज के खिलाफ आरोप साबित नहीं हो सके। अदालत ने इसी आधार पर उसे बरी कर दिया। यानी जिस मामले में शाहनवाज करीब आठ साल तक जेल में रहा, उसमें सुनवाई के अंत में उसे दोषी नहीं पाया गया।
परिवार के लिए भी लंबा रहा इंतजार
शाहनवाज के जेल में रहने का असर सिर्फ उसी तक सीमित नहीं रहा होगा। इतने लंबे समय तक किसी व्यक्ति का जेल में रहना उसके परिवार की जिंदगी को भी प्रभावित करता है। परिवार को लगातार अदालत की तारीखों, कानूनी प्रक्रिया और शाहनवाज की रिहाई की उम्मीद के बीच इंतजार करना पड़ा।
अब अदालत से बरी होने के बाद शाहनवाज के सामने अपनी जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की चुनौती होगी। करीब आठ साल जेल में बिताने के बाद सामान्य जीवन में लौटना उसके लिए आसान नहीं होगा। रोजगार, परिवार और समाज के बीच फिर से जगह बनाना भी उसके सामने एक बड़ी परीक्षा हो सकती है।
आठ साल बाद मिला बरी होने का फैसला
शाहनवाज के मामले में अदालत का फैसला इस बात को सामने लाता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मुकदमे में आरोपों को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्यों का होना कितना जरूरी है। 2018 में दर्ज हुए जानलेवा हमले के मामले में आरोपी बनकर जेल गए शाहनवाज को अब अदालत ने बरी कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस व्यक्ति के पास अपनी पैरवी के लिए निजी वकील करने तक के पैसे नहीं थे, उसने करीब आठ साल जेल में गुजार दिए। अंत में जब अदालत में आरोप साबित नहीं हुए तो उसे बरी कर दिया गया।
यह फैसला शाहनवाज के लिए राहत लेकर आया है, लेकिन उसके जीवन के वे करीब आठ साल वापस नहीं आ सकते, जो उसने जेल में रहते हुए बिताए। अब अदालत से बाहर आने के बाद उसके सामने नई शुरुआत करने की जिम्मेदारी होगी।


