लखनऊ: उत्तर प्रदेश में चुनाव का बिगुल बजने में अब महज चंद महीने ही बचे हैं। ऐसे में बीजेपी और समाजवादी पार्टी के अलावा बहुजन समाज पार्टी यानी की बीएसपी सुप्रीमो मायावती भी चुनावी रणनीतियों को मजबूत करने जुटी हुई हैं। मायावती गठबंधन की राजनीति से किनारा कर यूपी के चुनावी मैदान में अकेले उतरने का ऐलान कर चुकी हैं. लेकिन इन सबके बीच बीएसपी सुप्रीमो मायावती अपनी पार्टी की अगली पीढ़ी के नेता और नेतृत्व को लेकर कन्फ्यूज नजर आ रही हैं जिसकी बानगी आज भी देखने को मिली.

दरअसल कभी अपने भतीजे आकाश आनंद को राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ाने वाली मायावती ही उन्हें अपरिपक्व बता रही हैं और कह रहीं हैं कि उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती। जबकि अगर हम बीते तीन सालों को देखें तो पार्टी के राष्ट्रीय कॉर्डिनेटर रहे आकाश आनंद को तीन बार सजा भी दे चुकी हैं और सार्वजनिक तौर पर माफी मांगे जाने के बाद ही पद पर बहाल भी कर चुकी हैं. गुरुवार को मीटिंग में पहली बार मायावती ने आकाश के ही छोटे भाई और भतीजे ईशान आनंद को पटका पहनाकर उनका पार्टी में स्वागत किया।

मायावती कन्फ्यूज या अंतर्कलह बनी परेशानी ?

ऐसे में मायावती के इन हालियों कदमों से दो सवाल उठ रहे हैं। पहला ये कि क्या मायावती पारिवारिक अंतर्कलह से जूझ रही हैं या फिर अपने वोटरों और कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना चाहती हैं कि पार्टी अभी भी उन्हीं के हिसाब और फैसलों से चलेगी। मायावती के मन क्या चल रहा है उसे समझने के लिए आकाश आनंद को लेकर उनके आज दिए बयान को जानना जरूरी है क्योंकि इसी में सारे निहितार्थ छुपे हुए हैं।

मायावती ने आकाश आनंद को लेकर कहा, ‘उन्हें अभी और अधिक मैच्योर होने की जरूरत है। तब तक उन्हें पार्टी की बड़ी जिम्मेदारी देना ठीक नहीं होगा, क्योंकि चुनाव में अब कम समय बचा है। आकाश अभी विरोधियों के साम, दाम, दंड, भेद जैसे हथकंडों से निपटने के लिए भी तैयार नहीं हैं।

मायावती ने बैठक में आगे कहा, ‘कांशीराम भी परिवार और रिश्तेदारों को पार्टी के काम में सहयोग करने की अनुमति देते थे। लेकिन, वो उन्हें चुनाव लड़ाने या सरकार बनने पर कोई पद देने के पक्ष में नहीं थे। मैं भी इसी विचार पर कायम हूं। बसपा का लक्ष्य शोषित लोगों को सत्ता में भागीदारी दिलाना है। इस काम में मेरे लिए कोई अपना या पराया नहीं है। जो भी बसपा और बहुजन समाज के हित में काम करेगा, उसका स्वागत है।

इस बयान के बाद अब उनके समर्थक और वोटर सवाल उठा रहे हैं जिस आकाश आनंद को एक समय में मायावती का राजनीतिक वारिस समझा जा रहा था और जिसे खुद मायावती आगे बढ़ा रही थीं उसमें अब ऐसी क्या कमी आ गई. पहले ये समझिए की मायावती ने आकाश आनंद को कब-कब बड़ी जिम्मेदारी दी और फिर पद से हटा दिया।

कब-कब आकाश आनंद को मिली जिम्मेदारी और सजा

दरअसल 2022 में मायावती ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया था। बाद में उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की अहम जिम्मेदारी मिली और आकाश ने संगठन विस्तार में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। मगर 7 मई 2024 को लोकसभा चुनाव के बीच मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक और उत्तराधिकारी, दोनों पदों से हटा दिया और वजह बताई गई राजनीतिक अपरिपक्वता।

23 जून 2024 को आकाश की दोबारा वापसी हुई और उन्हें फिर उत्तराधिकारी बनाया गया। इसके बाद 2 मार्च 2025 को उन्हें सभी पदों से हटा दिया गया और अगले ही दिन पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

अप्रैल 2025 में आकाश ने मायावती को अपना राजनीतिक गुरु और आदर्श बताते हुए माफी मांगी। इसके बाद उन्हें बसपा में फिर जगह मिली और 18 मई 2025 को चीफ नेशनल कोऑर्डिनेटर जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी गई। अब 3 सितंबर को एक बार फिर से आकाश आनंद की काबिलियत पर सवाल खड़े करते हुए मायावती ने बड़ी जिम्मेदारी से उन्हें अलग कर दिया है।

क्या अपने ससुर की वजह से विलेन बन गए आकाश

आकाश से दूरी बनाने की एक वजह और भी समझी जा रही है और वो हैं आकाश आनंद के ससुर। बीएसपी में बीते कुछ समय में इसको लेकर विवाद भी हुआ था कि आकाश के ससुर अपने दामाद की बदौलत पार्टी पर अपना प्रभाव बनाकर उसे गुटों में बांटने की कोशिश में जुटे थे. जिसके बाद मायावती ने भतीजे आकाश को पद से हटाया और उसके ससुर अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

मायावती और बहुजन समाज पार्टी के इतिहास को अगर देखें तो कांशीराम से राजनीतिक विरासत मिलने के बाद मायावती की ये हमेशा कोशिश रही है कि वो खुद हमेशा पार्टी की सर्वमान्य नेता बनी रहें और शीर्ष तक पहुंचकर कोई भी उन्हें या उनके फैसलों को चुनौती देने की स्थिति में ना आए.

क्या बीएसपी के तेजप्रताप बन जाएंगे आकाश ?

यही वजह है कि कभी मायावती के काफी भरोसेमंद और मायावती की राजनीति के चाणक्य माने जाने वाले सतीश चंद्र मिश्रा को भी उन्होंने उस राजनीति हैसियत में कभी नहीं आने दिया. जबकि सतीश चंद्र मिश्रा ही वो शख्स थे जिनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ (दलित-ब्राह्मण का गठजोड़) फॉर्मूले से 2007 में मायावती सत्ता की कुर्सी तक पहुंची थीं.

ऐसे में मायावती के बयान और आकाश की जगह ईशान को जोड़कर देखा जाए तो तस्वीर भले अभी पूरी तरह साफ न हो, लेकिन पार्टी के भविष्य की सियासत में एक नई पटकथा जरूर लिखनी शुरू हो गई है। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या आकाश आनंद यूपी के नए तेजप्रताप होंगे और पार्टी की बागडोर तेजस्वी की तरह ईशान के हाथों में चली जाएगी ?

रिपोर्ट: कुणाल कौशल

 

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