“जानी यह रामपुरी चाकू है; लग जाए तो खून निकल आता है” अभिनेता राजकुमार के द्वारा बोला गया यह फिल्मी डायलॉग अक्सर आपने सुना होगा, रामपुरी चाकू अपनी धार की बदौलत ग्लोबल पहचान बना चुका है। मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश के जनपद रामपुर में दुनिया का सबसे बड़ा चाकू स्थापित किया जा चुका है। एक नजर डालते है इसके 100 वर्षों के इतिहास पर..
उत्तर प्रदेश के जनपद रामपुर का ब्रिटिश शासन काल के दौरान अपना अलग ही महत्व रहा है। वर्ष 1774 से 1949 तक कुल 10 नवाबों ने रामपुर की रियासत पर शासन किया है। रियासत काल के दौरान की कई उपलब्धियां यहां के इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज में। रामपुर रियासत के नवें नवाब हामिद अली खान ने सन 1900 से लेकर 1930 तक शासन किया, इस दौरान उनके दौर में रियासत को कई उपलब्धियां हासिल हुई है। वर्ष 1908 में पच्चू उस्ताद नाम के एक शख्स का जन्म हुआ जिनके पिता धारदार हथियार बनाया करते थे, लेकिन इन सबसे आगे बढ़कर पच्चू उस्ताद ने एक ऐसा धारदार हथियार बनाया जिसे जिसे मोड़कर हेंडल में छुपाया जा सकता है। चाकू से पहले नवाब, राजा, महाराजा और बादशाहों की फौजे तलवारों, खंजरों और कुकरी आदि धारदार हथियारों का इस्तेमाल करते थे। इन सबके बीच चाकू को मोड़कर उसके हत्थे के अंदर छिपाया जाने वाला चाकू उस दौर में काफी लोकप्रिय हुआ।
रामपुर में जन्में अभिनेता मुराद खान, प्राण और रजा मुराद उन चर्चित हस्तियों में शुमार है जिन्होंने रामपुर का नाम फिल्मों के रुपहेले पर्दे पर कभी न मिटने वाली अपनी अदाकारी से रोशन किया है। फिल्म अभिनेता मुराद खान और उनके बेटे रजा मुराद खान का जन्म में हुआ, तो वही अभिनेता प्राण ने भी यहां अपने पिता केवल कृष्ण सिकंद की तैनाती के दौरान अपने बचपन गुजरा है। अभिनेता प्राण अपने अभिनय से देशभर के सिनेमा घरों में लगने वाली फिल्मो के जरिए अपनी अलग पहचान बना चुके थे। उनके अलावा अपनी दमदार आवाज से सिनेमाघरों में गूंज मचा देने वाले अन्य अभिनेता मुराद खान और उनके बेटे रजा मुराद खान से भी रामपुर की पहचान स्थापित हुई। सर्वप्रथम अभिनेता प्राण ने फिल्म जगत को रामपुरी चाकू से रूबरू कराया था। यहां से फिल्मी दुनिया में रामपुरी चाकू का अभिनय में इस्तेमाल शुरु हुआ। मशहूर अभिनेता धर्मेंद्र, जॉनी वॉकर और अभिनेत्री हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म ‘राजा जानी” में हेमा मालिनी के हाथों में यह चाकू देखा गया। अभिनेता राजकुमार के द्वारा बोला गया डायलॉग “जॉनी यह बच्चों के खेलने की चीज नही, रामपुरी चाकू है; लग जाए तो खून निकल आता है” खूब सराहा गया।
नवाबी दौर के रामपुर में लोगों के मनोरंजन के लिए नुमाइश लगायी जाती थी। सौ साल पहले वर्ष 1925 में पच्चू उस्ताद ने स्वयं के द्वारा तैयार किया गया चाकू पहली बार इस नुमाइश में लोगों के सामने रखा था। नुमाइश में तत्कालीन नवाब हामिद अली खान भी मौजूद थे। उन्होंने जब पच्चू उस्ताद की इस नायाब कारीगरी का नमूना चाकू के रूप में देखा तो वह काफी खुश हुए और इसके बाद उन्होंने इनाम बतौर पर पच्चू उस्ताद को 25 रुपए दिए। तभी से चाकू की पहचान धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। रामपुरी चाकू के कारीगर मोहम्मद यामीन चाकू बनाने का कारोबार करते है। वे अपने काम से काफी खुश नजर आते हैं। 4 साल पहले उनका कारोबार खराब दौर से गुजर रहा था। तत्कालीन डीएम और वर्तमान मुरादाबाद मंडलायुक्त आंजनेय कुमार सिंह ने उनसे संपर्क साधकर उनके कारोबार को बढ़ावा दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि अब उनका चाकू बनाने का कारोबार अच्छा चल रहा है।
मंडल आयुक्त आंजनेय कुमार सिंह की पहल के चलते नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग चौराहे पर दुनिया का सबसे बड़ा चाकू स्थापित किया गया है। जिसकी कुल लंबाई 6.10 मीटर और कुल वजन 8 कुंतल है, लगाया गया है। चौराहे को और अधिक आकर्षक बनाने के उद्देश्य से चाकू सहित इसके सौंदर्यीकरण पर 52.52 लाख रुपए खर्च किए जा चुके हैं। आकार के हिसाब से यह चाकू दुनिया के सबसे बड़े चाकू की फेहरिस्त में भी आ चुका है और वही इस चौराहे का नाम चाकू चौराहा भी रख दिया गया है। सीडीओ नंदकिशोर कलाल भी चाकू के 100 वर्ष पूरा होने पर काफी खुश नजर आते हैं और बंद पड़े चाकू के कारोबार को एक बार से फिर से उभरता देख काफी उत्साहित भी प्रतीत होते हैं।
चुनाव में रामपुरी चाकू अक्सर नेताओं की जुबान पर भाषणों के रूप में अक्सर छाया रहता है। पूर्व के आम विधानसभा चुनाव में आजम खान अपने भाषण के दौरान चाकू तुलना में कलम को ज्यादा अहमियत देते नजर आए तो वही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कलम के साथ-साथ चाकू को भी रोजी-रोटी और हुनर का एक अहम हिस्सा बताया था। केंद्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार कौशल विकास कार्यक्रमों के तहत स्थानीय उत्पादों को देश ही नहीं विश्व स्तर पर पहुंचने के उद्देश्य से लगातार प्रयास कर रही है। सरकार के प्रयास के चलते वेदम हो चुका रामपुरी चाकू पहले की राजनीति के कारण आई ज़ंख से निकलकर अब एक बार फिर से चमकना शुरू हो गया और मोहम्मद यामीन जैसे हुनरमंद कारीगरों के कारखानों से तैयार होकर चाकू मार्केट की बची कुची 2-3 दुकानों पर भी बिक्री के लिए पहुंचने लगा है।
रिपोर्ट-मुजस्सिम खान

