लखनऊ: लाल टोपी और पार्टी के झंडे में हरा रंग दशकों से समाजवादी पार्टी की पहचान रही है। अब अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने यूपी विधानसभा चुनाव से चंद महीने पहले इस रंग में बदलाव किया है और अब लाल की जगह सपा छात्रसभा के कार्यकर्ता नीले रंग में दिखेंगे। जी हां उन्हें पार्टी ने नीली जींस और नीली टीशर्ट पहनकर राजनीतिक कार्यक्रमों का आयोजन करने को कहा है।
अखिलेश ने क्यों बदल दिया ‘रंग’
अब ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चुनाव से पहले यह सिर्फ रंगों का बदलाव ही है, या फिर इसके सियासी मायने हैं ? या फिर अखिलेश यादव दलित वोटों की गोलबंदी करने की कोई नई रणनीति अपना रहे हैं। आज हम इसी को जानेंगे।
दरअसल अगर समाजवादी पार्टी को देखें तो दशकों से झंडे से लेकर टोपी तक में लाल और हर रंगे के इस्तेमाल को एमवाई समीकरण यानी की यादव और मुस्लिमों के गठजोड़ से जोड़कर देखा जाता रहा है। हालांकि बीते दो विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद अखिलेश यादव अच्छे से समझ गए कि अब सिर्फ इसकी बदौलत ही सत्ता में वापसी संभव नहीं है।
यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने पीडीए फॉर्मूला यानी की पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को साथ लाने की मुहिम शुरू की जिसने उन्हें चुनाव में खूब फायदा पहुंचाया। समाजवादी पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 37 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की। अब पार्टी में छात्रसभा के ड्रेस कोड में बदलाव को इसका आखिरी पड़ाव माना जा सकता है।
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Gen Z को लुभाने की कवायद
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले दिल्ली में Gen Z आंदोलन के बाद जेनजी वोटर यूपी में चुनाव के केंद्र में आ गए हैं। बीजेपी जहां इन Gen Z वोटरों को देखकर ही रणनीति बना रही है तो अखिलेश भी उन्हें पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं। रंग में इस बदलाव को Gen Z से जोड़कर देखा जा रहा है क्योंकि माना जाता है कि नीला रंग उन्हें काफी पसंद आता है।
ड्रेस कोर्ड में नीले रंग के बदलाव का दूसरा कारण दलित समुदाय और वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। दरअसल यूपी में नीले रंग को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की विचारधारा और मायावती की बहुजन समाज पार्टी से जोड़कर देखा जाता है. ऐसे में अखिलेश यादव की नजरें इन दलित वोटरों और पूरी समुदाय पर है क्योंकि यूपी के चुनाव में यही निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वहीं मायावती इस दौरान पार्टी और परिवार की लड़ाई में उलझी हुई हैं जिसका फायदा अखिलेश यादव उठाना चाहते हैं।
अखिलेश यादव की पूरी कोशिश है कि मायवती से अलग होकर जो दलित, पिछड़ा और ओबीसी का वोटर बीजेपी की तरफ शिफ्ट हुआ है उसमें सेंध लगाकर उन्हें अपने पाले में लाया जाए। अखिलेश ने रंग में ये बदलाव क्यों किया है अगर इसे और गहरे से समझना है तो हमें यूपी में दलित वोटों के आंकड़े को समझना होगा.
यूपी में क्या है दलित वोटों का समीकरण
दरअल यूपी में कुल वोट शेयर का 21 से 22 फीसदी हिस्सा दलित वोटरों का है. यूपी में दलितों में कुल 66 उपजातियां है जिसमें मुख्यतौर पर जाटव (11 फीसदी), पासी (3-3.25 फीसदी), वाल्मीकि (3.15 फीसदी) कोरी और धोबी (दोनों एक-एक फीसदी) और गोंड, धनुक, खटिक (साढ़े चार फीसदी) प्रमुख हैं।
अखिलेश इसी में सेंध लगाना चाहते हैं क्योंकि साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इसी दलित वोटरों में से जाटवों को अपने पाले में करके सियासी वनवास को खत्म कर लिया था. बीजेपी को बीते विधानसभा चुनाव में कुल दलित वोटों का 20 से 27 फीसदी हिस्सा मिला था जिसने सत्ता की राह आसान बनाई थी। चूंकि मायावती अपनी पार्टी में नेतृत्व को लेकर पारिवारिक कलह (आकाश आनंद) का सामना कर रही हैं इसलिए भी अखिलेश की पूरी नजर बसपा से छिटके वोटरों पर हैं.
मायावती के वोटरों पर अखिलेश की नजर
अगर बीते विधानसभा चुनाव (2022) के नतीजों को ही देखें तो बीएसपी का वोट प्रतिशत 9.35-10 फीसदी तक घट गया था. 2017 में जहां बीएसपी को 22.23 फीसदी वोट मिले थे वहीं 2022 के चुनाव में पार्टी सिर्फ 12.88 फीसदी वोट ही हासिल कर पाई थी और सिर्फ एक सीट पर मायावती को जीत हासिल हुई थी. इससे अखिलेश यादव समझ गए हैं कि मायावती का वोट बैंक दरक कर बीजेपी के पाले में चला गया है जिसे अपनी तरफ लाया जा सकता है.
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दलित अस्मिता से जुड़ा है नीला रंग
ऐसे में नीले रंग को समाजवादी पार्टी से जोड़कर अखिलेश यादव मायावती के दरके हुए वोट बैंक में शामिल जाटव , पासी, वाल्मीकि कोरी और धोबी को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं. चूंकि ये दलित वोटर डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की विचारधारा को मानते हैं और नीले रंग को इनकी अस्मिता से जोड़कर देखा जाता है इसलिए उनका इस रंग से गहरा जुड़ाव है। ऐसे में अखिलेश यादव इसी नीले रंग के सहारे यूपी में सत्ता के समीकरण को साधने की कोशिश में लगे हुए हैं।
रिपोर्ट: कुणाल कौशल


