लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले शुक्रवार को राजनीति का एक अलग रंग देखने को मिला। ऐसा शायद पहली बार हुआ होगा कि सत्ता पक्ष में मंत्री पद पर बैठा कोई शख्स (Sanjay Nishad) विपक्ष के नेता के साथ ही एक हत्या को लेकर धरने पर बैठ जाए और अपनी ही सरकार से सवाल पूछने लगे। जी हां हम बात कर रहे हैं यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद की।
अपनी ही सरकार पर क्यों भड़के संजय निषाद
गोंडा में कारोबारी विनोद कुमार साहनी की हत्या के बाद संजय निषाद ने मोर्चा खोल दिया। अपनी ही सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ समाजवादी पार्टी के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष राजपाल कश्यप के साथ धरने पर बैठ गए। उन्होंने आरोपियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग की।
इस दौरान संजय निषाद पुलिस-प्रशासन से भी बेहद खफा नजर आए और कहा, ‘इतनी फोर्स क्यों लगाई है? ऐसा लगता है कि हमारे लोग अंग्रेजों के समय गुंडे-कातिल थे। आप सरकार की छवि क्यों खराब कर रहे हैं? ये फोर्स आरोपियों के घर पर लगाओ, ताकि वहां कोई आगजनी न हो और विरोधी लोग वहां कुछ न कर पाएं।
दरअसल संजय निषाद के इस मामले में सुपर एक्टिव होने और नाराजगी दिखाने के पीछे की बड़ी वजह मल्लाह और निषाद वोटों का वो राजनीतिक समीकरण है जिसने उन्हें सत्ता के दरवाजे तक पहुंचाया। अब ऐसे में सामने चुनाव है तो अपने वोट बैंक को बचाए रखने के लिए संजय निषाद इस मामले में ज्यादा आक्रमक नजर आ रहे हैं और अपनी ही सरकार को घेर रहे हैं।
2027 का रण, संजय निषाद किसके संग?
इस मामले में संजय निषाद चाहते तो मुख्यमंत्री और डीजीपी के सामने अपनी बात रख सकते थे, लेकिन उन्होंने धरने का रास्ता चुना। खास बात यह रही कि उनके साथ धरने में समाजवादी पार्टी के नेता भी नजर आए। इसके बाद यूपी की सियासी फिजा में सवाल उठने लगा, क्या यह सिर्फ अपने कार्यकर्ता और निषाद समाज के लिए न्याय की लड़ाई है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश भी है? ऐसे में निषाद समुदाय के वोटो के समीकरण को समझना जरूरी है।
वोटों के समीकरण का पूरा खेल
एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर यूपी में पिछड़ी जातियों में निषाद समाज के वोटों के समीकरण को देखें तो राज्य में करीब 4.33 फीसदी निषाद वोटर हैं. वहीं इस समूह में अगर मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप, धीमर आदि को जोड़ दें तो वोटरों की संख्या 12 से 18 फीसदी तक पहुंच जाती है जिस पर संजय निषाद की नजर है. खुद संजय निषाद भी इसी समुदाय से आते हैं.
ऐसे में सवाल कई हैं, क्या संजय निषाद की नजर इन निषाद वोटों पर है? क्या 2027 के चुनाव से पहले सीटों को लेकर कोई नई राजनीतिक सौदेबाजी शुरू हो गई है? क्या बीजेपी पर दबाव बनाने की रणनीति है? या फिर संजय निषाद वाकई अपना सियासी पाला बदलने की तैयारी कर रहे हैं? क्या यह सिर्फ एक कार्यकर्ता की मौत पर उठी आवाज है, या 2027 के चुनाव से पहले किसी बड़े सियासी समीकरण की शुरुआत है ? आने वाले दिनों में ये साफ हो जाएगा.
रिपोर्ट: कुणाल कौशल


